Hindi Poetry

दुष्चक्र

आंखें बोली आंसू से तुम क्यों थम गए भाई
उम्र बड़ी तो क्या हुआ अब भी जारी है दिलो दिमाग की लड़ाई…

आंसू बोला दिल से पूछो उसने कितनी बातें छुपाई
दिल ने दिमाग को दोषी ठहराया, कहा उसने दी थी
समझदारी की दुहाई ।

Hindi Poetry

बॉम्ब स्क्वाड का कुत्ता


एक बार बॉम्ब स्क्वाड के कुत्ते से मैंने पूछा
तुम्हें बारूद ढूंढते हुए
इब्राहीम के इत्र की खुशबू अायी
या शिव के धतूरे की
वह गुराया…
मैं पीछे हटा
उसने गुस्से में जवाब दिया
मुझे तो बस
उन दोनों के बीच
नफ़रत फैलाने वाले
की बदबू अायी।

Hindi Poetry

सपनों के बीज

हम सब अपने सपनों को बोते हैं
पर सबकी ज़मीन एक सी नहीं होती
सबको एक सी धूप नहीं मिलती
कांटे सबके हिस्से आते हैं
पर सबको माली की मदद नहीं मिलती

अकेले रहकर भी जो ठान ले तो
कांटों में भी गुलाब उगादे
साथ मिलने पर भी जो भटके तो
सूरजमुखी की भी चमक लुटा दे

लहलहाकर खुद
कभी जो सहरा दे दूसरों को तो
सदियों तक अपनी महक फैलाए
कभी जो कुचल दे तो
चंद महीनों में खुद सड़ जाए

हम सब अपने सपनों को बोते हैं

Hindi Poetry

नशे में धूत

जब हम लाखों टन अनाज को सड़ते देख कुछ नहीं कहते,
जब उस लाखों टन सड़े अनाज को शराब में घुलते देख कुछ नहीं कहते,
तो हम सब बिना पिये नशे में धूत हैं
और नशे में धूत लोगों को अपनी लाचारी नहीं दिखती
दूसरों की लाचारी की बात तो छोड़ ही दीजिए…

Hindi Poetry

सच

सच
सच के मायने बदल गए हैं
हम बस दो सच ही समझते हैं
पहले ही माना हुआ सच
दूसरों को झूठलाता सच
हमने अपने मन के एक तरफ काली
और एक तरफ सफेद स्याही पोत ली है
फिल्म में, टीवी में, इंटरनेट पर
सब जगह हम
अपने माने हुए सच को
और सच बनाने के
तरीक़े खोज रहे हैं
ताकि दूसरों की नज़रों में
जब खुद को देखें
तो हमारा कद ऊंचा लगे
हमारे अहम का कद
और जब अहम का कद
बढ़ जाता है
तो चीज़ें धुंधली दिखाई देती है
दिन दहाड़े किया गया खून
स्वाभिक मृत्यु लगने लगता है
इंडिया के स्टूडेंट्स
भारत के गुनाहगार लगते हैं
और खून पसीने से बना इंसान
अख़बारों में छपने वाला
एक सरकारी आंकड़ा

Hindi Poetry

जुमला और हमला

चुनावी मौसम में
नेताजी ने लगाया
“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”
का नारा
बेटी पढ़ी
आगे बढ़ी
उनकी गलतियों के ख़िलाफ
बेटी की आवाज़ उठी
तो जवाब में
नेताजी बोले
बेटी वो नारा नहीं था
था एक जुमला…
हमसे सवाल करोगी
तो हो जाएगा
तुम्हारी आज़ादी पर हमला

Courtesy: The Wire

On Friday, Natasha Narwal joined the list of students of falsely accused with UAPA for protesting against CAA & NRC and instigating Delhi Riots while the real perpetrators are on getting trained to become future MLAs and MPs.

The other students include:

1. Safoora Zargar

2. Meeran Haider

3. Asif Tanha

4. Debangana Kalita (Not charged UAPA but sent to Tihar Jail)

Hindi Poetry · Hindi Translation · My Inspirations · Uncategorized

यह कैसा समय है? (हिन्दी अनुवाद)

Original – What Kind Of Times Are These? By Adrienne Rich

नोट: यह शब्दशः अनुवाद नहीं है, रूह को पकड़ने की कोशिश है ।

यहां से कुछ दूर पर एक जगह है, जहां दो रास्ते मिलते हैं,
एक रास्ते पर दो काफ़ी लंबे पेड़ों के बीच हरी घांस अब भी उग रही है
और दूसरे रास्ते पर क्रांतिकारी आवाज़ें बीते हुए कल के अंधेरे में शांत हो गई है
उन दोनों रास्तों के बीचों बीच आवाज़ उठाने वाले लोगों के मिलने का एक कमरा है, जहां सालों से कोई नहीं आया
वो लोग भी अपनी आवाजों की तरह कल के अंधेरे में कहीं गायब कर दिए गए हैं

मैं कई बार उस डर की सीमा तक फल तोड़ने गया हूं,
यह गलतफहमी मत पालना की मैं कोई रूसी कविता पढ़ रहा हूं, ये जगह और कहीं नहीं…यहीं है,
हमारा देश प्रतिदिन खुद ही के सच… डरवाने सच की ओर बढ़ता जा रहा है
यहां के अपने तरीक़े हैं लोगों को…आवाज़ उठाने वाले लोगों को गायब करने के

मैं तुम्हें यह नहीं बताऊंगा कि यह जगह कहां है, जहां एक कण उजाले को भी अंधेरे के जाल में फंसाया जाता है-
भूतिया चौराहे, हरे भरे  उपवन जैसे बेचे जाते हैं
मुझे तो पहले ही पता है, कौन उसे खरीदता, बेचता और गायाब करता है

पर मैं तुम्हें यह नहीं बताऊंगा कि यह जगह कहां है,
फिर मैं तुमको बाकी सब क्यों बता रहा हूं?
क्योंकि मुझे पता है कि तुम अब भी सुन रहे हो,
क्योंकि इस भयावह समय में तुम्हारा सुनना ही सबसे
ज़रूरी है…
पेड़ों के बारे में ध्यान से सुनना और घास की तरह उगते जाना सबसे ज़रूरी है

अंग्रेज़ी में यहां पढ़े- https://www.poetryfoundation.org/poems/51092/what-kind-of-times-are-these

Hindi Poetry

स्थिरता और बदलाव

मेरे दादा को बदलाव पसंद नहीं
उन्होंने शायाद इतने उतार चढ़ाव देखें हैं
की वो हर चीज़ में एक स्थिरता खोजते हैं
मेरी मां को स्थिरता से ऊब जाती हैं
उन्होंने अपने शुरू के जीवन में ऐसा अभाव देखा है
जिसे बदलाव से ही पूरा किया जा सकता था
इस रोज़मर्रा के द्वंद्व के बीच एक आदमी खड़ा है
जिन्हें मैं पापा कहता हूं।

Hindi Poetry

रोटी, कपड़ा और मकान

सड़क पर निकले तो
दवाई छिड़क दी,
रेल की खिड़की में
नंगे बदन से भी पैसा मांग लिया
ट्रेन शुरू हुई तो बिल्डर्स के साथ मीटिंग करके
मजदूरों को कैद कर लिया गया
उनके जाने पर रोक लगा दी
क्या ताकतवर अपनी बची कुची शर्म
डोलोगाना कॉफी में मिला कर पी गए
उनका क्या कसूर है
यही की वह हमारे घर बनाते हैं
हमारे लिए अनाज उगाते हैं
या हमारे कपड़े बुनते हैं
हमारा रोटी, कपड़ा, मकान
तीनों उनसे ही आता है
और हमने उनसे ये ही नहीं
उनका सम्मान भी छीन लिया

Hindi Poetry · Writing Prompts

सपनों का किनारा

सपनों के किनारे पे बैठे थे तीन यार
एक के लिए बाप दादा का बड़ा जहाज आया
और वो विदेश निकल लिया
दूसरे के लिए एक नाव अाई
जिसे उसके मां और पिता ने
बड़ी मेहनत से बनाया था
दूसरा उसमें बैठा और बड़े शहर
निकल लिया
तीसरे ने इंतजार किया
सोचा कोई तो आएगा
कोई आया तो सही
पर उसे धक्का देकर चला गया
थोड़ी देर छटपटाने के बाद
वो तैरना भी सीख गया
उसे पता था अभी
दूसरा किनारा दूर है
पर वो तैरता रहा
बस तैरता ही रहा
और खुदकी मेहनत से
जिस दिन वो दूसरी ओर पहुंचा
वो ना बड़ा शहर था ना दूसरा देश
वो एक ऐसी दुनिया में पहुंच गया
जहां सागर का पानी तक
भी मीठा होता था

Featured Image- The Great Wave Off Kangawa by Hokusai

Hindi Poetry

जान और संसद

एक आदमी
जान से मर रहा है
एक आदमी जान बचा रहा है
एक तीसरा आदमी भी है
जो ना जान बचाता है, ना कोशिश करता है
वह सिर्फ़ दूसरों की जान से खेलता है
मैं पूछता हूँ–
‘यह तीसरा आदमी कौन है ?’
मेरे देश की संसद मौन है।

  • धूमिल की कविता रोटी और संसद से प्रेरित
Hindi Poetry

राम रामलाल

वह चला था चौदह बरस तक
अब उसे तुम चार दिवारी में बंद कर
उसके नाम पे लड़ कर धंधा खोलना चाहते हो
और उसे धर्म बताते हो
जब कर रहे हो उसका १००८ बार गुणगान टीवी के सामने
कोई रामलाल पैदल ही जा रहा है १००८ किलोमीटर अपने परिवार के पास
तुम पूछते हो मैं तो घर में बैठकर क्या कर सकता हूं
मैं कहता हूं खोल दो उसके लिए मंदिर के दरवाज़े
और बिताने दो रामलाल को कुछ रात वहां
मगर तुम फिर तपाक से कहोगे
हमारा मंदिर अपवित्र हो जाएगा
पवित्रता का दोगुलापन कहीं और दिखाना
उस रामलाल ने ही तुम्हारे मन्दिर को ईंट पत्थर जोड़ कर बनाया है

Hindi Poetry

सवाल करते रहो

कुछ साल पहले
शायद इमर्जेंसी के समय
मेरे पापा कुछ १५ साल के रहे होंगे
तब उनके एक दोस्त ने उन्हें एक कविता पढ़ने को दी
ओम प्रकाश वाल्मीकि की
मगर जैसे ही दादा ने देखा उन्होंने वह फट से छीन ली
और कूड़े में फेंक दी
और कहा यह सब मत पढ़ा कर
चल रामायण पढ़
उसमें भी तो राम शबरी के झूठे जामुन खाते हैं
देख कितने निष्पक्ष हैं वो
खैर वो कविता एक कूड़ा बिनने वाले को मिली
वो भी करीब करीब मेरे पापा जितना ही था
उस बच्चे को एक भला आदमी
शायद बुद्ध का अनुयायी
रात को पढ़ाता था
उस बच्चे ने यह कविता को अपने घर की दीवार पर लगा लिया
ना जाने कितने घर टूटे,
कितने जले
कितनी बार उसने रिजर्वेशन की लड़ाईयों में
इसे पढ़ा
अंधी सरकारें और अंधी होती गई
गूंगे बहरे लोगों ने अपने दोनों कान
नोटों की गड्डी से भर लिए
मगर सब लड़ाइयों में उसका एक ही हथियार था
वह कविता
एक दिन ऐसा आया
की वो बच्चा एक प्रोफेसर बना
और मैं उनसे पढ़ने गया
उन्होंने कहा रामायण भी पढ़ो
ओम प्रकाश वाल्मीकि भी
दोनों में जो अच्छी सीख है वो लो
और सवाल करते रहो
वह नेता जिन्हें तुम राम का स्वरूप मानते हो
दलितों के घर खाना खाकर,
अख़बार के लिए फोटो खिंचाकर
खुदपर गंगाजल क्यों छिड़कता है?

     

Hindi Poetry · Writing Prompts

Pehla Lesson- Insaaniyaat

Use farak nahi padta aapki inn dharm ke naam par hui ladaiyon se,
Wo toh roz bhook se ladta hai,
Usse Right Wing – Left Wing se bhi koi matlab nahi,
Wo toh apne pankh doondh raha hai,
Ab agar iss chai ki channi ko hatakar,
Usse koi kitaab thama de,
Kitaab jismein Insaaniyat ho pehla lesson,
Toh usse apne pankh mehsoos hone lagange…
Nahi toh kuch saal baad uske haat main bhi bandook hogi
Jo dusron ke paron ko zakhmi kar degi…

Hindi Poetry · Writing Prompts

Woh Padh Raha Tha…

Woh padh raha tha…
Jab bhagwa chaddi main
Vardi waale ghar main ghuse
Aur usse goli maardi

Wo padh raha tha…
Wah kitaabein jo humein saath laayein
shayad yahi unse bardaasht nahi hua

Wo padh raha tha…
Taaki naam se nahi kaam se jaana jaaye,
Wo jo bhi pehne sar uthake chal paaye,

Wo padh raha tha
Taaki wo sawaal puch sake
Unse jo apni taaqat ke nashe main hain
Par wo toh nashe main the
Isliye usse goli maardi…

Wo padh raha tha

Hindi Poetry · My Inspirations

कोई खतरा नहीं- ओमप्रकाश वाल्मीकि

शहर की सड़कों पर
दौड़ती-भागती गाड़ियों के शोर में
सुनाई नहीं पड़ती सिसकियाँ
बोझ से दबे आदमी की

जो हर बार फँस जाता है
मुखौटों के भ्रमजाल में
जानते हुए भी कि उसकी पदचाप
रह जाएगी अनचीन्ही

नहीं आएगा उसके हिस्से
समन्दर की रेत में पड़ा सीपी का मोती
लहरें नहीं धोएँगी पाँव
हवाएँ भी निकल जाएँगी
अजनबी बनकर

फिर भी वह देखता है
टकटकी लगाए
भीड़ के सैलाब को
मुश्किल होता है
चेहरों को पहचान लेना

घोषणा होती हैं
अन्तर्राष्ट्रीय मंच से —
‘नस्ल और जाति का प्रश्न हल करना है
मानव विकास के लिए’

चुप्पी साध लेती है दिल्ली
ख़ामोश हो जाते हैं गलियारे
संसद के गलियारे
राष्ट्रपति भवन की दीवारें
और धार्मिक पण्डे

आवाज़ें फुसफुसाती हैं —
‘नस्ल और जाति जैसी
कोई अवधारणा नहीं है
हमारी महान संस्कृति में’

चारों ओर ख़ामोशियों का घना अरण्य
उग आता है
खड़ी हो जाती है
रास्ता रोककर कँटीली बाड़
महान सभ्यता की चिन्ता में

शामिल हो जाते हैं
पेड़-पौधे, पशु-पक्षी
पर्यावरण पर बोलना और सोचना
कितना आसान होता है
नहीं रहता कोई ख़तरा

न धर्म-विरोधी होने का डर
न साप्रदायिकता का भय
नहीं आएगा डराने-धमकाने
कोई दल
आदि देवता का अस्त्र हाथ में लेकर
संस्कृति भी बची रह जाएगी

वैसे भी संस्कृति अक्सर चुप ही रहती है
उस वक़्त जब चीख़ते हैं
बेलछी, कफल्टा, पारस बिगहा,
नारायणपुर, साँढूपुर,
मिनाक्षीपुरम, झज्जर-दुलीना
और गोधरा-गुजरात…

संस्कृति और धर्म जश्न मनाते हैं
जब सिसकता है आदमी
आग में झुलसकर
सड़क पर बिखरी लाशें
सड़ने लगती हैं
जिनकी शिनाख़्त करने
कोई नहीं आता

जो भी आएगा
फोड़ दी जाएँगी उसकी आँखें
या फिर कर दिया जायएगा घोषित
राष्ट्र-विरोधी

घोषणा होती है —
खिड़की दरवाज़े बन्द कर लो
महाराजा विक्रमादित्य की सवारी
आने वाली है

सड़कों पर सुनाई पड़ती है
क़दमताल करते बूटों की ध्वनि
हवा में तैरती है बारूदी गन्ध

चुनाव होते हैं हर बार
सभ्य नागरिक निकल पड़ते हैं
संसद और विधानसभाओं की ओर
बिना असलाह के

भूख और मौत से भयभीत आदमी
नहीं जानता
यह सब क्यों होता है
इतनी जल्दी-जल्दी

क्यों गिने जाते हैं
जातियों के सिर
चुनाव के दिनों में
बड़े से बड़ा नेता खड़ा होता है
जाति की जनगणना के बाद ही

यह अलग बात है
सब मौन रहते हैं
‘डरबन’ की घोषणा पर
पड़ोसी देश का राजा
परिक्रमा करता है मन्दिर की
चढ़ाता है बलि भैंसे की

और,
पशु-पक्षियों के हितैषी
निकल जाते हैं टूर पर
देश से बाहर

या फिर किसी तहख़ाने में बैठकर
देख-सुन रहे होते हैं प्रवचन
लखटकिया सन्तों का
सवाल रहते हैं स़िर्फ सवाल
जिनके उत्तर ढूँढ़ना ज़रूरी नहीं है

सभ्य नागरिकों के लिए
‘कहीं’ कोई खतरा नहीं है
मामला धर्म का है
चुप रहने में ही भला है’ —

सलाह देकर निकल जाता है
राष्ट्रीय अख़बार का सम्पादक
चमचमाती गाड़ी में

मैं देख रहा हूं वह सब जिसे देखना जुर्म है
फिर भी करता हूँ गुस्ताखी
चाहो तो मुझे भी मार डालो
वैसे ही जैसे मार डाला एक प्यासे को
जिसने कोशिश की थी
एक अँजुली जल पीने की

उस तालाब का पानी
जिसे पी सकते हैं कुत्ते-बिल्ली
गाय-भैंसेंं
नहीं पी सकता एक दलित
दलित होना अपराध है उनके लिए

जिन्हें गर्व है संस्कृति पर
वह उतना ही बड़ा सच है
जितना उसे नकराते हैं
एक साज़िश है
जो तब्दील हो रही है
स्याह रंग में
जिसे अन्धेरा कहकर
आँख मून्द लेना काफ़ी नहीं है !

Hindi Poetry

ओ नारी—समता की सहपाठी हो तुम!

ओ नारी—
समता की सहपाठी हो तुम!
अनेक महान सम्बोधन दिये तुम्हें 
पर दिया नहीं
तुम्हें निर्णय का अधिकार
तुम्हें रिश्ते-नातों श्रृंखला से जकड़ा—
शस्त्र और शास्त्र का भय दिखलाकर

जो पाँव तुम्हारे साथ चलने की खाते हैं क़सम
वे ही तुम्हें ठुकराते
जो हाथ तुम्हारा हाथ थामते
वे ही गला दबाते
फिर भी ओ नारी
अनन्त विसंगतियों-विकृतियों के बीच
पत्थर पर उगती—
दूब-सी उगती रही हो तुम!

Credits: kavitakosh.org

Hindi Poetry · Writing Prompts

Adhuri Kavita

Dil tehal raha tha
Tanhai ke veeraane main
Tabhi usse ek phool dikha
Phool jismein teri mehak thi
Uss mehak ko jab andar khincha tab
Titliyaan jo so gayi thi,
Phir uchal khud karne lagi
Dil ke pass aayi aur phool par baith gayi
Honthon ne aadha chaand banaya
Aankhon ki chamak se sooraj sharmaya…
Teri mehak ne hi itna kuch kar diya,
Ab tu bhi aaja saamne,
Tere bina…
Yeh kavita abhi adhuri si lagti hai…
Hindi Poetry

Thik Karein Hum

Aa ek dusre ko thik karein hum
Thodi dosti se, thode pyaar se…
Aa ek dusre ko thik karein hum
Thoda dil se, thoda dimaag se…
Aa ek dusre ko thik karein hum
Thoda Dhoop se, thoda chaanv se…
Aa ek dusre ko thik karein hum
Thoda hansi se, thoda aansoon se…
Aa ek dusre ko thik karein hum
Thoda kal se, thoda aaj se…
Aa ek dusre ko Insaan karein hum
Chupte hue andar ke shaitaan se…
Hindi Poetry

Ek khat khudko (Seekh)

Seekh
Pal pal seekh, Din din seekh
Papa se seekh, Mummy se seekh
Chalna seekh, Uthna seekh
Dada se seekh, Nani se seekh
Nani ki kahaaniyon se seekh
Dada ki jawaaniyon se seekh
Pal pal seekh, Din din seekh
Accha seekh, Bura seekh
Bure ko Acche main badalna seekh
Pyaar se seekh, Nafrat se seekh
Nafrat ko Pyaar main badalna seekh
Pal pal seekh, Din din seekh
Seekh ke khud ko badalna seekh
Khud se sab kuch karna seekh
Dost se seekh, Ajnabi se seekh
Ajnabi ko dost main badalna seekh
Pal pal seekh, Din Din seekh
Khushi se seekh, Aansoon se seekh
Aansoon ko Khushi main badalna seekh
Sooraj se seekh, Chaand se seekh
Sooraj aur Chaand dono banna seekh
Pal pal seekh, Din din seekh
Insaan hi hai na,
Tu bas seekh…
Hindi Poetry

Ghar Ki Subah

Iss Kavita se mere ghar ke savere ki gandh aayegi!
Subah savere jab pheli baar Papa uthaane aate hain
Toh unki chillahat ke saath main ek sugandh shaving cream ki aati hai
Jo ‘5 minute aur’ ka bahana sunkar kam hone lagti hai…
Phir neeche jab aata hu,
Tab brush se phele aa rahi khud ke moonh ki durgandh
Mandir se aayi Maa se aa rahi chandan ki khushboo se ladne lagti hai…
Phir Dadaji ke pass jab pranaam karne jata hu
Toh wahaan garam chai ki khushboo
Akhbaar ke baasi propaganda se ladti hai
Iss yudh par alpviram Dadaji ki paad hi lagaati hai…
Phir 100 kadam tehal ke bathroom ki aur wo jab prasthan karte hain
Main mauka dekh kar Sports ka panna nikaal leta hu,
Aur kitchen se aa rahi Jalebi Pohe (because stereotype) ki khushboo ki taraf khicha chala jata hu
Par jab wahaan pahunchta hu toh apne liye bas gandh rahit Green Tea hi pata hu…
Aur Communist Pait kab Capitalist tond ban gayi iske flashback main chala jata hu
Kuch aise katt jaati thi ghar ki subah
Par kya ab Naye sheher ki nayi subah, nayi hawa jab laayegi…
Kya woh apne saath wohi sugandh jise kehta hu main ghar apne saath la payegi…
Hindi Poetry

Mera Kya Kasoor Hai???

Mein 6 saal ki bhi ho sakti hun,
Mein 26 saal ki bhi ho sakti hun,
Par usse fark kya padna hai…
Mein gaon ki bhi ho sakti hun,
Mein bade shahar ki bhi ho sakti hun,
Par usse fark kya padna hai….
Mere saath toh ek hi kaam hona hai.
Ab jab main pal pal toot rahi hu,
Main aaj duniya waalon se puchti hun Mera kya Kasoor hai,
Woh chup rah jaate hain kehte hain yeh toh duniya ka dastoor hai.
Kuch chote log toh mere libaas ko hi doshi tharaatein hain,
Aur wohi darinde mere hijab ko bhi apni nazaron se napak kar jaate hain.
Iss bhoj ke niche dabe kabhi mein maaut ko gale lagati hun…
Par jab aawaz uthati hun tab daba di jaati hun.
Kabhi neta toh kabhi abhineta karte hain mera shikar.
Woh hanste-hanste chale jaate hain mein roti rah jaati hu…