Hindi Poetry

सच

सच
सच के मायने बदल गए हैं
हम बस दो सच ही समझते हैं
पहले ही माना हुआ सच
दूसरों को झूठलाता सच
हमने अपने मन के एक तरफ काली
और एक तरफ सफेद स्याही पोत ली है
फिल्म में, टीवी में, इंटरनेट पर
सब जगह हम
अपने माने हुए सच को
और सच बनाने के
तरीक़े खोज रहे हैं
ताकि दूसरों की नज़रों में
जब खुद को देखें
तो हमारा कद ऊंचा लगे
हमारे अहम का कद
और जब अहम का कद
बढ़ जाता है
तो चीज़ें धुंधली दिखाई देती है
दिन दहाड़े किया गया खून
स्वाभिक मृत्यु लगने लगता है
इंडिया के स्टूडेंट्स
भारत के गुनाहगार लगते हैं
और खून पसीने से बना इंसान
अख़बारों में छपने वाला
एक सरकारी आंकड़ा

Hindi Poetry

जुमला और हमला

चुनावी मौसम में
नेताजी ने लगाया
“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”
का नारा
बेटी पढ़ी
आगे बढ़ी
उनकी गलतियों के ख़िलाफ
बेटी की आवाज़ उठी
तो जवाब में
नेताजी बोले
बेटी वो नारा नहीं था
था एक जुमला…
हमसे सवाल करोगी
तो हो जाएगा
तुम्हारी आज़ादी पर हमला

Courtesy: The Wire

On Friday, Natasha Narwal joined the list of students of falsely accused with UAPA for protesting against CAA & NRC and instigating Delhi Riots while the real perpetrators are on getting trained to become future MLAs and MPs.

The other students include:

1. Safoora Zargar

2. Meeran Haider

3. Asif Tanha

4. Debangana Kalita (Not charged UAPA but sent to Tihar Jail)

Stories · Writing Prompts

चिड़िया और पेड़

एक बार मैंने अपनी बालकनी से एक पेड़ और चिड़िया की बात सुनी, उसी के कुछ अंश।

पेड़: बात मान मैं बोल रहा हूं ना उड़ जा

चिड़िया: आप ही बताओ कैसे जाऊं, अभी तो बच्चों को ढंग से उड़ना तक नहीं आया है

पेड़: तू बात को समझ नहीं रही है, वो तो लाकडाउन की वजह से मैं अब भी खड़ा हूं

चिड़िया: नहीं तो…

पेड़: नहीं तो यह इंसान मुझे अर्बन डेवलपमेंट के नाम पे काटने का प्लान कर रहे हैं

चिड़िया: हां पर अब तो यह समझ जाएंगे ना यह पृथ्वी हमारी भी है

पेड़: अरे मैं बहुत साल से देख रहा हूं, इनमें से बहुत कम को ही हमारी फ़िक्र है, बाकी सब तो लालची थे और लालची रहेंगे

चिड़िया (चिंतित): तो मतलब मेरा घर भी उजड़ जाएगा

पेड़: इसलिए तो कह रहा हूं उड़ जा…

चिड़िया ने पेड़ की बात मान ली, और अपने बच्चों के साथ उड़ने की प्रैक्टिस शुरू कर दी, मगर जल्दी सीखने के चक्कर में एक बच्चा बिजली के तार में फंस गया और उसके पंख पर चोट लग गई और वो बीच रास्ते में गिर गया। यह तो अच्छा था कि लाकडाउन के कारण रास्तों पर गाड़ी नहीं थी वरना… अब चिड़िया की घबराहट और बढ़ गई। वो जैसे तैसे अपने बच्चे को पेड़ की सबसे नीची  डाली तक ले जा पाई।

तभी एक मजदूर की नजर उस पेड़ पर पड़ी और वह उसके नीचे आराम करने बैठ गया। उसकी हालत बहुत खराब थी, वो कुछ 250 मील की पैदल यात्रा करके यहां तक पहुंचा था और अभी उसे 200 मील और चलना था। उसके बदन पर कुछ लाठियों के निशान थे और उसके बदन से केमिकल की बदबू आ रही थी। बीच रास्ते में भले लोगों ने बिस्किट के पैकेट और पानी की बॉटल भी दी थी, मगर अब उसमें दो बूंद पानी बचा होगा। उसने पेड़ से फल तोड़ने की कोशिश की मगर उसके अंदर इतनी शक्ति नहीं बची थी कि वह फल तोड़ पाए। आखिर में थक हार कर वो बैठ गया और रोने लगा। अपने रोने में उसे किसी और के रोने की भी आवाज़ अायी।

वो उठ खड़ा हुआ और आस पास देखने लगा…

मजदूर: कौन है

पेड़ हिलने लगा और मजदूर डर गया मगर उसने जैसे ही भागने की कोशिश की, वो गिर गया

पेड़: भैया यह चिड़िया रो रही है, में पेड़ बोल रहा हूं

मजदूर (पीछे रेंगते हुए): कौन… कौन है, भूखे के साथ क्यों मज़ाक करते हो।

पेड़: हम क्यों मज़ाक करेंगे, हम खुद ही परेशान हैं

मजदूर: अच्छा तुम पेड़ बोल रहे हो तो फल गिरा कर बताओ

पेड़ और ज़ोर से हिलने लगा और उस पर से एक फल गिरा। मजदूर ने झट से उस फल को उठाया और दो बूंद बचा पानी डाला और उसे खाने लगा।

मजदूर: धन्यवाद पेड़… मगर यह चिड़िया क्यों रोती है, उसे हमारे जैसे चलना कहां है… वो तो जहां चाहे उड़ सकती है, जो चाहे खा सकती है

पेड़: भैया अर्बन डेवलपमेंट का नाम सुना है

मजदूर: अरे नाम मत लो उस राक्षस का, शहर के एक किनारे पर मैं सालों से झोपड़ी में रह रहा था, पर अचानक पहले तो इस लोकडाउन ने काम बंद कराया फिर एक दिन झोपड़ी खाली करने को कह दिया, बोले झोपड़ी तोड़कर, पास के नाले को साफ कर, सुंदर झील बनाएंगे, वो भी लोकडाउन के बीचों बीच।

पेड़: अरे तुमने तो पूरी गाथा ही गढ़ दी, पर बिलकुल यही काम इस चिड़िया के साथ भी होने वाला है

मजदूर: मतलब…

पेड़:इसके घर को भी थोड़े दिन में कुछ लोग बिना बताए उजाड़ने वाले

मजदूर: इसके घर को तो मतलब… तुम्हें… तुम्हें काट रहे हैं

पेड़: और मेरी जगह बिजली का खंबा लगाएंगे…

मजदूर: …

चिड़िया (सांस भरते हुए): और मैंने यहां से जाने की कोशिश की तो मेरा बच्चा ज़ख्मी हो गया

मजदूर फल खाते खाते रुक गया और कुछ सोचने लगा… थोड़ी देर बाद उसने अपने सामान में से एक टोकरी निकाली

मजदूर: एक काम करते हैं, चिड़िया तुम अपने बच्चों को इसमें रख लो।

चिड़िया थोड़ी डर गई

पेड़ (मजदूर से): क्यों भला?

मजदूर: अरे डरो मत! हमारे गांव में बहुत से पेड़ हैं, वहां उसे नया घोंसला बनाने की भरपूर जगह मिलेगी

चिड़िया: और मैं तुम पर विश्वास क्यों करूं

मजदूर: पहली बात तो घर टूटने का दर्द मैं जानता हूं, दूसरी बात पेड़ ने मेरी जान बचाई है, इतना तो मैं कर ही सकता हूं

पेड़ खुशी के मारे ज़ोर से मचलने लगा और उसने आठ- दस फल और गिरा दिए

पेड़: रास्ते के लिए यह रख लो

चिड़िया: पर पेड़ का क्या होगा

पेड़: अरे मेरी फ़िक्र छोड़ अब

मजदूर: ऐसे कैसे छोड़ दें, गांव पहुंचकर सबसे पहले अपने आंगन में तुम्हारे बीज लगाऊंगा और फिर तुम्हारी अच्छे से देख रेख करूंगा

चिड़िया खुश हो गई…उसने पेड़ को अलविदा कहा और उसे शुक्रिया किया

पेड़: भैया सुनो, चिड़िया ना रास्ते भर के पेड़ों को जानती है, जब भी यह फल खत्म हो जाए, दूसरे पेड़ भी तुम्हें खुशी खुशी फल दे देंगे और बीच में अाई नदियों से तुम पानी ले पाओगे।

मजदूर ने पेड़ को सीने से लगाया और उसमें एक नई सी शक्ति आ गई। वह चिड़िया और उसके बच्चों को टोकरी में ध्यान से रखकर गांव की ओर चल दिया ।

सूरज ने यह सब देख, अपना ताप उस दिन के लिए थोड़ा कम कर दिया।
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नोट: अगर आपने यहां तक पढ़ने की हिम्मत करी है तो इस बात को आप मानते होंगे कि प्रकृति से हम हैं, ना की हम से प्रकृति। यह लेख लिखने के दो कारण हैं-  जब हम लोग लॉकडाउन में घर के अंदर हैं, चंद शाक्तिशाली और लालची लोगों ने

1. ‘अमेज़ोन ऑफ द ईस्ट’ कहे जाने वाले देहिंग पतकाई वाइल्ड लाइफ संक्चरी में कोयला खनन की अनुमति देकर, 270000 पेड़ों और असंख्य प्रजातियों के पशु पक्षी को खतरे में डाल दिया है।

2. कुछ दिनों पहले यह घोषणा हुई है कि पश्चिमी घाट पर रेल लाइन बिछाने के लिए 220000 पेड़ों को काटा जाएगा।

अगर हम प्रकृति का ख्याल नहीं रखेंगे तो वो कैसा विनाश कर सकती है, यह आपको ओडिशा और बंगाल की हालत देखकर समझ आ गया होगा। इसलिए हम सब को इसके खिलाफ आवाज़ उठानी होगी। पशु पक्षी, पेड़ और इंसान को साथ आगे बढ़ना है नहीं तो हमारा विनाश बहुत दर्दनाक होगा। ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाएं और जहां भी पेड़ कटने की खबर आए उसके खिलाफ आवाज़ उठाएं।

धन्यवाद।

Cover Art: Vaisakh Manoharan

Hindi Poetry · Hindi Translation · My Inspirations · Uncategorized

यह कैसा समय है? (हिन्दी अनुवाद)

Original – What Kind Of Times Are These? By Adrienne Rich

नोट: यह शब्दशः अनुवाद नहीं है, रूह को पकड़ने की कोशिश है ।

यहां से कुछ दूर पर एक जगह है, जहां दो रास्ते मिलते हैं,
एक रास्ते पर दो काफ़ी लंबे पेड़ों के बीच हरी घांस अब भी उग रही है
और दूसरे रास्ते पर क्रांतिकारी आवाज़ें बीते हुए कल के अंधेरे में शांत हो गई है
उन दोनों रास्तों के बीचों बीच आवाज़ उठाने वाले लोगों के मिलने का एक कमरा है, जहां सालों से कोई नहीं आया
वो लोग भी अपनी आवाजों की तरह कल के अंधेरे में कहीं गायब कर दिए गए हैं

मैं कई बार उस डर की सीमा तक फल तोड़ने गया हूं,
यह गलतफहमी मत पालना की मैं कोई रूसी कविता पढ़ रहा हूं, ये जगह और कहीं नहीं…यहीं है,
हमारा देश प्रतिदिन खुद ही के सच… डरवाने सच की ओर बढ़ता जा रहा है
यहां के अपने तरीक़े हैं लोगों को…आवाज़ उठाने वाले लोगों को गायब करने के

मैं तुम्हें यह नहीं बताऊंगा कि यह जगह कहां है, जहां एक कण उजाले को भी अंधेरे के जाल में फंसाया जाता है-
भूतिया चौराहे, हरे भरे  उपवन जैसे बेचे जाते हैं
मुझे तो पहले ही पता है, कौन उसे खरीदता, बेचता और गायाब करता है

पर मैं तुम्हें यह नहीं बताऊंगा कि यह जगह कहां है,
फिर मैं तुमको बाकी सब क्यों बता रहा हूं?
क्योंकि मुझे पता है कि तुम अब भी सुन रहे हो,
क्योंकि इस भयावह समय में तुम्हारा सुनना ही सबसे
ज़रूरी है…
पेड़ों के बारे में ध्यान से सुनना और घास की तरह उगते जाना सबसे ज़रूरी है

अंग्रेज़ी में यहां पढ़े- https://www.poetryfoundation.org/poems/51092/what-kind-of-times-are-these

Hindi Poetry

स्थिरता और बदलाव

मेरे दादा को बदलाव पसंद नहीं
उन्होंने शायाद इतने उतार चढ़ाव देखें हैं
की वो हर चीज़ में एक स्थिरता खोजते हैं
मेरी मां को स्थिरता से ऊब जाती हैं
उन्होंने अपने शुरू के जीवन में ऐसा अभाव देखा है
जिसे बदलाव से ही पूरा किया जा सकता था
इस रोज़मर्रा के द्वंद्व के बीच एक आदमी खड़ा है
जिन्हें मैं पापा कहता हूं।

Hindi Poetry

रोटी, कपड़ा और मकान

सड़क पर निकले तो
दवाई छिड़क दी,
रेल की खिड़की में
नंगे बदन से भी पैसा मांग लिया
ट्रेन शुरू हुई तो बिल्डर्स के साथ मीटिंग करके
मजदूरों को कैद कर लिया गया
उनके जाने पर रोक लगा दी
क्या ताकतवर अपनी बची कुची शर्म
डोलोगाना कॉफी में मिला कर पी गए
उनका क्या कसूर है
यही की वह हमारे घर बनाते हैं
हमारे लिए अनाज उगाते हैं
या हमारे कपड़े बुनते हैं
हमारा रोटी, कपड़ा, मकान
तीनों उनसे ही आता है
और हमने उनसे ये ही नहीं
उनका सम्मान भी छीन लिया

Hindi Poetry · Writing Prompts

सपनों का किनारा

सपनों के किनारे पे बैठे थे तीन यार
एक के लिए बाप दादा का बड़ा जहाज आया
और वो विदेश निकल लिया
दूसरे के लिए एक नाव अाई
जिसे उसके मां और पिता ने
बड़ी मेहनत से बनाया था
दूसरा उसमें बैठा और बड़े शहर
निकल लिया
तीसरे ने इंतजार किया
सोचा कोई तो आएगा
कोई आया तो सही
पर उसे धक्का देकर चला गया
थोड़ी देर छटपटाने के बाद
वो तैरना भी सीख गया
उसे पता था अभी
दूसरा किनारा दूर है
पर वो तैरता रहा
बस तैरता ही रहा
और खुदकी मेहनत से
जिस दिन वो दूसरी ओर पहुंचा
वो ना बड़ा शहर था ना दूसरा देश
वो एक ऐसी दुनिया में पहुंच गया
जहां सागर का पानी तक
भी मीठा होता था

Featured Image- The Great Wave Off Kangawa by Hokusai

English Poetry · Writing Prompts

Untied Laces

I close my eyes
To find words for this poem
And I see a 10-year old kid
Of ‘5th E’ eating his tiffin
Alone in the class
Sitting in the library alone,
Limping in the corridors
When the other kids ran
After the last school bell
I don’t know why is he alone
Maybe that’s how he felt
All his school life
When only the special shoes
He wore
Were his friends
‘Real Friends’
Special shoes
Laces of which
Were always untied
Like the rhythm
Of these lines

Cinema

A Rifle And A Bag

 

On the Bandra-Mahim junction, there is a very famous statue with a quote by Dr V.V. Kamat- ‘A child gives birth to a mother’. The documentary, ‘A Rifle and A Bag’ by Arya Rothe, Cristina Hanes and Isabela Rinaldi amongst other things encapsulate the quote very beautifully. The film is an intimate portrayal of Somi, a former Naxalite who surrendered along with her husband with the hope to provide a better life for their two children. It is based in a camp in interior parts of Maharashtra set up by the government for former Naxalites.


Now, first of all, let me be clear, I know very little about the Naxalism in India but on a simple google search, I found that it is considered as a greater danger than terrorism by the establishment, as it is currently affecting around 22 states of our country. There are polarizing articles almost preaching Pro Naxal and Anti Naxal narratives. I am still trying to understand the various forms of oppression, the origin of it and their current state in our country. Nevertheless, what I think (in all my naivety) is the first step towards fighting any oppression is imparting education and Somi understands it more than we do. That’s what she fights for throughout the film.


But does anyone care, especially when you are on the wrong side of the margin. The powerful make laws and put in systems to pretend that they are helping. But in turn, what they are creating is a more complex maze that will leave the oppressed bewildered. Standing in ATM Lines, Standing in line to prove their identity or walking miles to reach home in a pandemic without adequate food, the biggest sufferers are always the marginalised.

A screenshot from the film


Despite all this, this film rarely catches Somi in a vulnerable state. She sings songs of resilience around the fire every night to find the inner strength to keep up her fight. The silences between the family conversations tell more about the relationship of Somi and her husband (much younger to her) than words could ever express.


One of the most important aspects of a documentary film set up your relationship with the protagonist, both while making and watching. Kudos to the makers for making us believe that we are a part of Somi’s journey. The frames created by the makers also try to supplement what is going on in her mind. The frontal framing seems very deliberate so that Somi looks in control of the situation. Rarely, when she is anxious and uncertain, it is shot in the cramped and dingy space of the camp mostly at night. In the later moments of the film, when she opens up to her son a bit, it is shot in a wide landscape with a picturesque background.


All in all, A Rifle and A Bag somehow tries to break the pro-Naxalite and anti-Naxalite narrative often dangerously looming to the level of propaganda. It presents the problem in a humanistic and relatable manner by showcasing a mother’s journey trying to get the best life for his child.


The filmmakers Arya Roth from India, Isabella Rinaldi from Italy and Cristina Hanes from Romania graduated from the Doc Nomads Program and make films under the banner of ‘NoCut Film Collective’. Here’s hoping their camera remains this honest in their next project and inspire young filmmakers like us.


The online screening of this film is happening worldwide till 7th May on https://online.visionsdureel.ch/

PS: Thanks to Suyash Kamat for tweeting about it.

English Poetry

I Write Because

I write because

When I put pen to paper

I can be a tree’s trembling heart

When an axe is about to hit it

Or a dog’s warm heart

When his Papa returns every night

I can be my old man’s weak heart

Living his last days

Or a little girl’s cheerful one

When she sings in the shower

I can be an artist’s burning heart

Trying to change the world

Or an athlete’s racing heart

Trying to win the world

I write because

I can be all heart

And nothing more