Cinema

Humanity and Films

I don’t really like writing about films, but now I realised that I wasn’t watching the right films. But are there any right or wrong films though? Yes, there are, the films that becomes an experience is a right film. Period. The film that connects to you and lets you get in touch with your humanity again is a right film for you. Getting in touch with your own humanity is a big relief in this highly complex mechanical world. The film which transcends human boundaries of language and culture and is yet grounded beautifully in its own reality is a right film. It is very subjective. Keeping this in mind, I made a list of 5 movies from last year which I thought were RIGHT! Actually, I had existential crisis after watching them. Apart from making me cry in the theatre, these films stayed with me and I don’t think they will ever leave me again. They will hold my hand and inspire me to take baby steps in the world of film making. Though it is a list, please don’t focus on the rank. I will not write about these films but just attaching the links to the trailers here. I will also tell you my crying duration during the film.

#5 Sudani From Nigeria (Malyalam) (India)

Crying Duration: 5-7 minutes
PS: This film is available on Netflix

#4- Manto (Hindi) (India)

Crying Duration: 7-10 minutes
PS: Available on Neflix

#3- Shoplifters (Japanese) (Japan)

Crying Duration- 10 minutes
PS: Watched it in Kolkata International Film Festival

#2- Roma (Mixtec, Spanish) (Mexico, USA)

Crying Duration- 10 minutes
PS: Available on Netflix

#1- Capernaum (Arabic) (Lebanon)

This film makes me cry every time I think about it
PS: I watched it in Kolkata International Film Festival

Special Mention- The Price Of Free (Hindi, English) (India)

Crying Duration: 5 minutes
PS: Available on Youtube

This is my list, please let me know in the comments section which movie made you cry in 2018.

My Inspirations · Photography · Writing Prompts

Bachpan



Masoomiyat ne Bachpan se pucha- Nanhe munne bacche teri muthi main kya hai?


Wo chup raha, thodi der main uske kaan main bola- Aye masoomiyat, tu chale ja, malik ne dekh liya toh bahut maarega…

Please watch- The Price Of Free– A powerful documentary on the life and work of 2014 Nobel Laureate – Kailash Satyarthi

Credits:

https://priceoffree.com/

https://www.youtube.com/soulpancake

Hindi Poetry · My Inspirations

कोई खतरा नहीं- ओमप्रकाश वाल्मीकि

शहर की सड़कों पर
दौड़ती-भागती गाड़ियों के शोर में
सुनाई नहीं पड़ती सिसकियाँ
बोझ से दबे आदमी की

जो हर बार फँस जाता है
मुखौटों के भ्रमजाल में
जानते हुए भी कि उसकी पदचाप
रह जाएगी अनचीन्ही

नहीं आएगा उसके हिस्से
समन्दर की रेत में पड़ा सीपी का मोती
लहरें नहीं धोएँगी पाँव
हवाएँ भी निकल जाएँगी
अजनबी बनकर

फिर भी वह देखता है
टकटकी लगाए
भीड़ के सैलाब को
मुश्किल होता है
चेहरों को पहचान लेना

घोषणा होती हैं
अन्तर्राष्ट्रीय मंच से —
‘नस्ल और जाति का प्रश्न हल करना है
मानव विकास के लिए’

चुप्पी साध लेती है दिल्ली
ख़ामोश हो जाते हैं गलियारे
संसद के गलियारे
राष्ट्रपति भवन की दीवारें
और धार्मिक पण्डे

आवाज़ें फुसफुसाती हैं —
‘नस्ल और जाति जैसी
कोई अवधारणा नहीं है
हमारी महान संस्कृति में’

चारों ओर ख़ामोशियों का घना अरण्य
उग आता है
खड़ी हो जाती है
रास्ता रोककर कँटीली बाड़
महान सभ्यता की चिन्ता में

शामिल हो जाते हैं
पेड़-पौधे, पशु-पक्षी
पर्यावरण पर बोलना और सोचना
कितना आसान होता है
नहीं रहता कोई ख़तरा

न धर्म-विरोधी होने का डर
न साप्रदायिकता का भय
नहीं आएगा डराने-धमकाने
कोई दल
आदि देवता का अस्त्र हाथ में लेकर
संस्कृति भी बची रह जाएगी

वैसे भी संस्कृति अक्सर चुप ही रहती है
उस वक़्त जब चीख़ते हैं
बेलछी, कफल्टा, पारस बिगहा,
नारायणपुर, साँढूपुर,
मिनाक्षीपुरम, झज्जर-दुलीना
और गोधरा-गुजरात…

संस्कृति और धर्म जश्न मनाते हैं
जब सिसकता है आदमी
आग में झुलसकर
सड़क पर बिखरी लाशें
सड़ने लगती हैं
जिनकी शिनाख़्त करने
कोई नहीं आता

जो भी आएगा
फोड़ दी जाएँगी उसकी आँखें
या फिर कर दिया जायएगा घोषित
राष्ट्र-विरोधी

घोषणा होती है —
खिड़की दरवाज़े बन्द कर लो
महाराजा विक्रमादित्य की सवारी
आने वाली है

सड़कों पर सुनाई पड़ती है
क़दमताल करते बूटों की ध्वनि
हवा में तैरती है बारूदी गन्ध

चुनाव होते हैं हर बार
सभ्य नागरिक निकल पड़ते हैं
संसद और विधानसभाओं की ओर
बिना असलाह के

भूख और मौत से भयभीत आदमी
नहीं जानता
यह सब क्यों होता है
इतनी जल्दी-जल्दी

क्यों गिने जाते हैं
जातियों के सिर
चुनाव के दिनों में
बड़े से बड़ा नेता खड़ा होता है
जाति की जनगणना के बाद ही

यह अलग बात है
सब मौन रहते हैं
‘डरबन’ की घोषणा पर
पड़ोसी देश का राजा
परिक्रमा करता है मन्दिर की
चढ़ाता है बलि भैंसे की

और,
पशु-पक्षियों के हितैषी
निकल जाते हैं टूर पर
देश से बाहर

या फिर किसी तहख़ाने में बैठकर
देख-सुन रहे होते हैं प्रवचन
लखटकिया सन्तों का
सवाल रहते हैं स़िर्फ सवाल
जिनके उत्तर ढूँढ़ना ज़रूरी नहीं है

सभ्य नागरिकों के लिए
‘कहीं’ कोई खतरा नहीं है
मामला धर्म का है
चुप रहने में ही भला है’ —

सलाह देकर निकल जाता है
राष्ट्रीय अख़बार का सम्पादक
चमचमाती गाड़ी में

मैं देख रहा हूं वह सब जिसे देखना जुर्म है
फिर भी करता हूँ गुस्ताखी
चाहो तो मुझे भी मार डालो
वैसे ही जैसे मार डाला एक प्यासे को
जिसने कोशिश की थी
एक अँजुली जल पीने की

उस तालाब का पानी
जिसे पी सकते हैं कुत्ते-बिल्ली
गाय-भैंसेंं
नहीं पी सकता एक दलित
दलित होना अपराध है उनके लिए

जिन्हें गर्व है संस्कृति पर
वह उतना ही बड़ा सच है
जितना उसे नकराते हैं
एक साज़िश है
जो तब्दील हो रही है
स्याह रंग में
जिसे अन्धेरा कहकर
आँख मून्द लेना काफ़ी नहीं है !

Hindi Poetry

ओ नारी—समता की सहपाठी हो तुम!

ओ नारी—
समता की सहपाठी हो तुम!
अनेक महान सम्बोधन दिये तुम्हें 
पर दिया नहीं
तुम्हें निर्णय का अधिकार
तुम्हें रिश्ते-नातों श्रृंखला से जकड़ा—
शस्त्र और शास्त्र का भय दिखलाकर

जो पाँव तुम्हारे साथ चलने की खाते हैं क़सम
वे ही तुम्हें ठुकराते
जो हाथ तुम्हारा हाथ थामते
वे ही गला दबाते
फिर भी ओ नारी
अनन्त विसंगतियों-विकृतियों के बीच
पत्थर पर उगती—
दूब-सी उगती रही हो तुम!

Credits: kavitakosh.org